केदारनाथ मंदिर के अलावा भी देवभूमि में मौजूद है पंचकेदार मंदिर, जानिए उनके बारे में….

पंचकेदार
image credits: Uttarakhand DIPR/ Twitter

देवभूमि उत्तराखंड जहां अनेखो देवी देवताओं के मंदिर है, जहां चारों धाम है. उसी देवभूमि पर पंचबद्री, पंचप्रयाग और पंचकेदार है. वैसे तो केदारनाथ का मुख्य मंदिर एक ही है, लेकिन उसके अलावा 4 और ऐसे मंदिर है जिन्हें केदारनाथ मानते है. तो आज जानते है इन्ही मंदिरों के बारे में.

पंचकेदार मंदिर

श्री केदारनाथ मंदिर

भगवान शिव के 11वे ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजे जाने वाले इस मंदिर से तो हम सभी परिचित है. ये ही मुख्य केदारनाथ मंदिर है. ऋषिकेश से लगभग 230 किमी दूर स्थित ये मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में आता है. इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तो को 16 किमी की पैदल यात्रा करनी पढ़ती हैं. इस मंदिर की ऐसी मान्यता भी की इस ज्योतिर्लिंग का आधा भाग यहां केदारनाथ में है और आधा नेपाल के पशुपतिनाथ में.

मदमहेश्वर मंदिर

इस मंदिर को पंचकेदार में दूसरा केदार माना जाता है. भगवान शिव के मध्य भाग के दर्शन होनेंके कारण इसे मदमहेश्वर नाम मिला. इस मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको रुद्रप्राग से ऊखीमठ पहुंचना होता है, उसके बाद वहां से मोटर वाहन के जरिए उनियाणा गांव तक जाते है और अंत में 10 किमी की चढ़ाई पार कर मंदिर पहुंचते है.

तुंगनाथ मंदिर

पंचकेदारों में तीसरे स्थान पर हैं तुंगनाथ मंदिर. इस मंदिर में भगवान शिव का नाभि से ऊपर और सर से नीचे का भाग है, यानी यहां धड़ प्रतिष्ठित है. इस मंदिर में सिर्फ गर्मियों के समय में ही पूजा की जाती है, उसके बाद यह चल विग्रह मूर्ति मुक्कुमठ ले जाई जाती हैं जहां इसकी शीतकालीन पूजा की जाती है. रुद्रनाथ मंदिर
चौथे स्थान पर है रुद्रनाथ मंदिर. तहत शिवजी के मुखाकृति के दर्शन होते है. इस मंदिर को पितरों के तारण के लिए सबसे श्रेष्ठ मंदिर माना जाता है.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस जगह पर ही नारद मुनि ने भगवान शिव को कनखल(हरिद्वार) में दक्ष के यज्ञ के दौरान देवी सती की दाह की बात बताई थी. भगवान रुद्रनाथ यहां गुफा में विराजते है

कल्पेश्वर मंदिर

पंचकेदारों में अंतिम स्थान पर है कल्पेश्वर मंदिर. इस मंदिर में भगवान शिव का जटाजूट प्रतिष्ठित है. यह मंदिर उग्रम गांव की एक नदी के पास है. इस मंदिर तक पहुंचने के लिए अलकनंदा पुल पार करके 7 किमी पैदल यात्रा करके जाना पड़ता है. इस मंदिर की कहानी पौराणिक कथाओं के अनुसार देवराज इंद्र को ऋषि दुर्वासा द्वारा दिए गए श्राप से मुक्ति के लिए कल्प वृक्ष की प्राप्ति से जुड़ी है. देवराज इंद्र ने इस जगह भगवान शिव की आराधना कर उनसे कल्प वृक्ष प्राप्त किया था. इसीलिए इस मंदिर का नाम कल्पेश्वर मंदिर पड़ा.

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