सिख धर्म के लंगर का क्यों है इतना महत्व?

लंगर
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भारत में यूं तो कई धर्म है और हर धर्म की अपनी कुछ विशेषताएं हैं. ऐसा ही एक धर्म है सिख धर्म जिससे हम सभी बेहद अच्छे से रूबरू है. सिख धर्म की खास बात यह है कि वह किसी भी व्यक्ति की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं. धर्म की एक और खूबसूरती है, यह खूबसूरती है गुरुद्वारे का लंगर. जी हां गुरुद्वारे का लंगर एक ऐसा लंगर होता है जहां किसी भी धर्म का बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा व्यक्ति आकर भोजन कर सकता है और गुरुद्वारे की सेवा कर सकता है. इस लंगर में सभी लोग जो भी भोजन करते हैं, वह सभी एक साथ जमीन पर अनेकों पंगतो में बैठ जाते हैं. जिसके बाद सेवादार आ कर उन्हें भोजन परोस कर सेवा करते है.

लंगर का महत्व

लंगर का अर्थ होता है सामूहिक भोज. सिख धर्म की इस सुंदर परंपरा की सबसे खास बात यह है कि ये किसी खास दिन नहीं होता, बल्कि साल के बारहों महीने चलता है! जिसमें किसी भी धर्म संप्रदाय के लोग एक-साथ बैठ कर भोजन कर सकते हैं. इतिहास में ऐसे तो सामूहिक भोज लगाने की परंपरा तो बहुत पहले से थी, लेकिन वह केवल कुछ जाति विशेष के लोगों द्वारा ही लगाया जाता था. वहाँ एक सम्प्रदाय के लोग ही खाना खाते थे. लेकिन सिख धर्म में जब इस परंपरा की शुरुआत हुई तब लंगर में किसी भी जाति को सर्वोपरि न मानते हुए सभी को एक ही ईश्वर के रचित इंसान समझकर उन्हें खाना खिलाया जाता था.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लंगर की शुरुआत सिख धर्म गुरु, गुरुनानक देव जी के द्वारा लगभग सन् 1480 में हुई थी. गुरुनानक देव जी को उनके पिता जी ने सच्चा सौदा शुरू करने के लिए 20 रुपए दिए थे मगर उन्होंने वह रुपए सच्चा सौदा में न इस्तेमाल कर उसकी कुछ खाद्य सामग्री खरीद कर उन संतों को दे दी जो पिछले कई दिनों से भूखे थे. तभी से लंगर की यह प्रथा शुरू हुई और ऐसा माना जाता है जहां गुरुनानक जी ने उन संतों को भोजन कराया था वह जगह आज गुरुद्वारा सच्चा सौदा साहिब है, जोकि आज पाकिस्तान में स्थित है.

गुरु देव जी ने सेवादारों (गुरुद्वारे में जो कार्य करते हैं) को लंगर तैयार करने का तरीका और उसकी परम्पराओं के बारे में भी बताया. गुरु अमर दासजी का आदेश था, “पहले पंगत, फिर संगत” अर्थात उनसे मिलने जो भी आए, वो पहले लंगर (भोजन) खाकर ही उनसे मिले. स्वयं बादशाह अकबर भी जब गुरुजी के दर्शन करने आए, तो उन्होंने भी सभी के साथ जमीन पर बैठकर खाना खाया और फिर उनके दर्शन किए.

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