इस प्रकार किया था पांडवों ने केदारनाथ मंदिर का निर्माण, जानिए पौराणिक कथा

केदारनाथ मंदिर
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भारत में यूं तो भगवान शिव के अनेकों भक्त हैं और शिवजी के हजारों मंदिर भी हैं. इन्हीं शिव मंदिरों में से कुछ मंदिर प्रमुख हैं, जिनको हम 12 ज्योतिर्लिंग भी कहते हैं. इन 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग केदारनाथ मंदिर है. बाबा केदारनाथ ज्योतिर्लिंग 4 धाम में से भी एक है.

इस वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते कोविड 19 प्रोटोकॉल्स के साथ मंदिर के कपाट खोल दिए गए हैं. श्रद्धालुओं को सभी नियमों का पालन करने के आदेश भी दिए गए हैं. कोरोना संक्रमण के चलते तीर्थयात्री और स्थानीय लोग कम पहुंच रहे हैं. साल के करीब 6 महीने बर्फ से ढ़के इस पवित्र मंदिर में भगवान शिव का वास माना जाता है.

केदारनाथ मंदिर की पौराणिक कथा

केदारनाथ धाम की यूं तो प्राचीनकाल से ही कई कथाएं प्रचलित हैं. मगर आज हम बात करेंगे महाभारत काल की कथा की.

महाभारत काल में महाभारत का युद्ध जीतने के बाद 5 पांडवों में से सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया था. जिसके बाद युधिष्ठिर ने लगभग चार दशकों तक हस्तिनापुर पर शासन किया. महाभारत युद्ध के बाद कुछ समय पश्चात एक दिन पांचों पांडव श्री कृष्ण के साथ बैठकर महाभारत युद्ध के विषय में चर्चा कर रहे थे. उसी चर्चा के बीच में पांडवों में से किसी एक पांडव ने श्री कृष्ण को कहा, कृष्ण! हम सभी भाइयों ने इस महाभारत युद्ध को तो जीत लिया, अब हम सभी भाइयों के पास ब्रह्मा को मारने के साथ-साथ अपने ही भाइयों और बहनों को मारने का समय है. इसे कैसे हटाएं?

पांडवों के इस प्रश्न का जवाब देते हुए श्री कृष्ण ने कहा कि यह सत्य है कि आप सभी ने युद्ध जीत लिया हो किन्तु अपने गुरु और भाई बहनों को मारकर आप सभी सबसे बड़े पाप के भागीदार बन चुके हो. इस पाप से मुक्त होना अत्यंत कठिन है. इस समस्त संसार में केवल महादेव ही ऐसे देवता हैं जो आपको इन पापों से मुक्ति दिला सकते हैं.

भगवान श्री कृष्ण की बातों को सुनने के बाद से पांडव इसी चिंता में रहने लगे कि कैसे इस पाप के बोझ को खत्म किया जा सकता है. एक दिन पांडवों को पता चला कि वासुदेव अपने शरीर को त्याग कर अपने निवास स्थान पर लौट आए हैं. इसके बाद पांडवों को भी धरती पर रहना सही नहीं लगा. फिर उन्होंने परीक्षित को राज्य सौंप दिया, हस्तिनापुर ले लिया, हस्ती की बाढ़ को छोड़ दिया और भगवान शिव की तलाश में निकल पड़े.

इसी तलाश के दौरान भगवान शिव को ढूंढने के लिए पांडवों ने काशी से लेकर हिमालय तक का सफर तय किया. पांडव जहां भी जाते थे शिवजी वहां से पहले ही गायब हो जाते थे. इसके बाद सबसे बड़े पांडव युधिष्ठिर ने भगवान शिव को याद करते हुए कहा कि हे प्रभु! हमें पता है कि आप हमसे छिप रहे हैं क्योंकि हमने घोर पाप किया है, किंतु हम भी इस वचन पर अडिग रहेंगे कि आपके दर्शन के बिना नही जाएंगे.

तभी एक बैल ने उन पर छलांग लगा दी. यह देख गदाधारी भीम उससे लड़ने लगे. जब बैल ने अपना सिर चट्टानों के बीच छिपा लिया, तो भीम ने उसकी पूंछ पकड़ ली और खींचने लगे. इसने धड़ को सिर से अलग कर दिया और धड़ को शिवलिंग में बदल दिया. कुछ समय बाद शिवलिंग से भगवान शिव प्रकट हुए. जिसके बाद शिव ने पांडवों के पाप माफ कर दिए और पांडवों ने इस मंदिर का निर्माण कराया.

इस प्रकार से धरती पर निर्माण हुआ महादेव के केदारनाथ मंदिर का.

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