Friday special: वैभव लक्ष्मी के व्रत का महत्व और विधि, जानिए इनके जन्म की कहानी के बारे में…

वैभव लक्ष्मी
credit: wikimedia

श्रद्धा, पूजा उपासना,भक्ति आदि को भारतीय अपने आराध्य ईश्वर के प्रति अपना कर्तव्य और अधिकार मानते है। भारतीयों के दैनिक जीवन में शायद ही कोई ऐसा दिन होता हो, जिस दिन वह अपने आराध्य देव की आराधना ना करते हों. सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवता या देवी को समर्पित होता है और उस दिन उनकी विशेष पूजा की जाती है. जिससे विशेष लाभ भी प्राप्त होता है. इसी तरह सप्ताह में शुक्रवार का दिन को लक्ष्मी देवी का होता है. और इस दिन व्रत रखा जाता है, इस व्रत को वैभव लक्ष्मी व्रत भी कहा जाता है. यह व्रत स्‍त्री ही नहीं बल्कि पुरुष भी रख सकते हैं।

वैभव लक्ष्मी जी के जन्म की कथा

पुराणों में माता लक्ष्मी की उत्पत्ति के बारे में कई अलग अलग कथाएं बताई गईं हैं. एक कथा में कहा गया है वह भृगु ऋषि की बेटी है. जबकि दूसरी कथा में कहा गया है कि जब देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई थी. तब विष्णु भगवान के कहने पर देवताओं और राक्षसों ने मंथन किया था. जिससे 14 रतनों की प्राप्ति हुई थी. इन्हीं 14 रत्नो में से एक रत्न के रूप में लक्ष्मी जी अवतरित हुई थीं।

‘लक्ष्मी’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- एक ‘लक्ष्य’ तथा दूसरा ‘मी’ अर्थात लक्ष्य तक ले जाने वाली देवी लक्ष्मी। कहा जाता है कि लक्ष्मी जी ने अपने अवतरण के साथ ही भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में स्वीकार लिया था.

हिंदू धर्म में लक्ष्मी जी को धन की देवी माना जाता है. पुराणों के अनुसार लक्ष्मी जी बेहद चंचल स्वभाव की है.वह कभी भी किसी स्थान पर स्थिर नहीं रहती। इसलिए धन प्राप्ति के लिए लोग लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं. एक कथा के आधार पर यह भी मना जाता है. कि समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी जी शारीरिक रूप में अवतरित ना होकर स्वर्ण के रूप में अवतरित हुईं थी.

वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा

प्राचीन काल में लोग एक दूसरे के साथ ही रहा करते थे. उनके दुख सुख में उनकी सहायता किया करते थे. परंतु नए जमाने के लोगों में ऐसा स्वभाव देखने को नहीं मिलता है, आजकल के लोग एक दूसरे से ईर्ष्या की भावना रखते हैं, परन्तु अभी भी कुछ लोग प्रकार के हैं जो आज भी पुराने रीति रिवाजों को मानते हैं.

ऐसे ही एक परिवार में शीला व उसके पति की गृहस्ती थी. शीला भगवान की महिमा को मानने वाली अर्थात धार्मिक प्रवृत्ति और अत्यंत शांत स्वभाव की महिला थी. उसका पति भी एक संस्कारी, ईमानदार, विवेकशील व्यक्ति था। दोनों ही पति पत्नी अपने जीवन को सुख से व्यतीत करते थे.

कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और भगवान की भक्ति में लीन होकर समय व्यतीत करते थे. उनकी गृहस्ती आदर्श ग्रहस्ती मानी जाती थी, शहर के लोग उनकी गृहस्ती की सराहना करते थे. शीला की गृहस्ती खुशी से चल रही थी, परन्तु कहा जाता है कि ‘कर्म की गति अकल है’ विधाता के लिखे लेख कोई नहीं समझ सकता है। इन्सान का नसीब पल भर मेें राजा को रंक बना देता है और रंक को राजा।

शीला के पति के पिछले जन्म के कर्म भोगने बाकी रह गये होगें कि वह बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। वह भी सभी कि भांति रुपए पैसों का लालच करने लगा तथा करोड़पति बनने की इच्छा रखने लगा और इसी कारण रोडपति बन गया.

उसकी स्थिति रास्ते के भिखारी के जैसी हो गई. शहर में शराब, जुआ, रेस, चरस, गंजा वगैरह जैसी बुरी आदतो में शीला का पति भी फंस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई. जल्द से जल्द पैसे वाला बनने के लालच में दोस्तों के साथ जुआ भी खेलने लगा.

इस तरह उसने बचाई हुई धनराशि, पत्नी के गहने, सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिए थे. शीला सुशील और संरकारी स्त्री थी, उसको पति के वर्ताव से बहुत दुःख हुआ. किन्तु वह भगवान पर भरोसा करके बड़ा दिल रख कर दुःख सहती रही. कहा जाता है कि ‘सुख के पीछे दुःख और दुःख के पीछे सुख’ आता ही है.

इसलिये दुःख के बाद सुख आएगा ही, ऐसी श्रद्धा के साथ शीला प्रभु भक्ति में लीन रहने लगी. अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी. आर्यधर्म के संस्कार वाली शीला ने खड़े होकर द्वार खोला तो देखा कि एक मांजी खड़ी थी.

उनके चेहरे पर अलौकिक तेज था, उनकी आंखों में से मानो अमृत बह रहा था, उनका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था, उनको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई. शीला के रोम-रोम में आनंद की अनुभूति होने लगी. शीला उन मांजी को आदर के साथ घर में ले आई. घर में बैठाने के लिए कुछ नहीं था. अतः शीला ने सकुचा कर एक फटी हुई चादर पर उनको बैठाया.

माँजी बोली:- क्यो शीला!मुझे पहचाना नहीं?
शीला ने सकुचा कर कहा:- मां! आपको देखते ही बहुत खुशी हो रही है. बहुत शांति हो रही है, मेरे मन को बहुत खुशी हो रही है. ऐसा लगता है कि मैं बहुत दिनों से जिसे ढूंढ रही थी वे आप ही है, पर आपको पहचान नहीं सकती.

माँजी ने हंसकर कहा: क्यो ? भूल गईं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन कीर्तन होते हैं, तब मैं भी वहां आती हूँ. तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं इसलिए मैं तुम्हें देखने चली आई.

मांजी के अति प्रेम भरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया, उसकी आंखों में आंसू आ गए, और वह बिलख-बिलख कर रोने लगी.

मांजी ने कहा:- बेटी! सुख और दुख तो धूप और छांव जैसे हैं. धैर्य रखो बेटी. मुझे तेरी सारी परेशानी बता.
माँजी के व्यवहार से शीला को काफी सांत्वना मिली और सुख की आस में उसने मांजी को अपनी सारी कहानी सुनाई.

कहानी सुनकर मांजी ने कहा:- कर्म की गति न्यारी होती है. हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पढ़ते हैं. इसलिए तू चिंता मत कर अब तू कर्म भुगत चुकी है. अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएंगे. तू तो मां लक्ष्मी की भक्त है. मां लक्ष्मी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं. वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता बनाएं रखती हैं. इसलिए तू धैर्य रखकर मां लक्ष्मी जी का व्रत रख. इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा.
शीला के पूछने पर मांजी ने उसे व्रत की सारी विधि बताई.

मांजी ने कहा:- बेटी मां लक्ष्मी का व्रत बहुत सरल है उसे ‘वरदललक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है. यह व्रत करने वाले की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. वह सुख, संपत्ति और यश प्राप्त करता है.

शीला यह सुनकर आनंदित हो गई. शीला ने जब संकल्प करके आंखें खोली, तो सामने कोई नहीं था. वह विस्मित हो गई कि मांजी कहां गई? शीला को तत्काल यह समझते देर ना लगी कि मांजी और कोई नहीं साक्षात लक्ष्मी जी ही थी.

दूसरे दिन शुक्रवार था सवेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मांजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत रखा. आखिर में प्रसाद वितरण हुआ, यह प्रसाद पहले पति को खिलाया. प्रसाद ग्रहण मरते ही पति के स्वभाव में फर्क आ गया. उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं. शीला को बहुत आनंद हुआ और उसके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई.

शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से 21 शुक्रवार तक वैभव लक्ष्मी व्रत रखा. 21वें शुक्रवार को मांजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को वैभव लक्ष्मी व्रत की सात पुस्तकें उपहार में दी. फिर माता के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि का वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगी.

हे माँ लक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मांगी थी. वह व्रत आज पूर्ण किया है हे माँ! मेरी हर विपत्ति दूर करो. हम सबका कल्याण करो. जिससे संतान ना हो उसे संतान देना, सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना, कुंवारी लड़की को मनभावन पति देना. जो आपका यह चमत्कारी ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करें, उनकी सब विपत्ति दूर करना, सभी को सुखी करना. हे माँ! आप की महिमा अपार है. ऐसा बोलकर लक्ष्मी जी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को प्रणाम किया.

व्रत के प्रभाव से शीला का पति फिर से अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा. उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे हुए गहने छुड़ा लिए. घर में धन की बाढ़ सी आ गई. घर में पहले जैसी सुख शांति छा गई. वैभव लक्ष्मी व्रत का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधि पूर्वक वैभव लक्ष्मी व्रत करने लगी.

माता के अन्य नाम

माता वैभव लक्ष्मी के श्रीदेवी, कमला, धन्या, हरिवल्लभी, विष्णुप्रिया, दीपा, दीप्ता, पद्मप्रिया, पद्मसुन्दरी, पद्मावती, पद्मनाभप्रिया, पद्मिनी, चन्द्र सहोदरी, पुष्टि, वसुंधरा आदि नाम प्रमुख हैं.

देवी लक्ष्मी अपने विभिन्न स्वरूपो में संसार का कल्याण करती है तथा उनका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ जो भी रखता है. उसके परिवार में सुख, धन व आनन्द बना रहता है.

यह भी पढ़ें: Mangal Dosh: कुंडली में मंगल दोष के कारण हो रही है विवाह में देरी, तो अपनाएं ये उपाय..