Manasa devi temple: जानें शिव पुत्री के रूप में विख्यात मनसा देवी जी की मान्यता के बारे में…

मनसा देवी
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देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड राज्य में यूं तो अनेखो देवी देवताओं के मंदिर है. यहां चारों धाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री है. वहीं यहां हरिद्वार में पावन मां गंगा की धारा बहती है और भगवान शिव के प्राचीन मंदिर है.

इसी जगह में एक और प्रमुख मंदिर है जिसे हम भगवान शिव की पुत्री मनसा के रूप में भी जानते है, यह मंदिर मनसा देवी मंदिर के नाम से विश्व में प्रख्यात है.

इस मंदिर को माता सती की 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ माना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां पर माता सती का मस्तिष्क गिरा था जिस वजह से इस शक्तिपीठ का नाम मनसा देवी पड़ा.

अब जानते है कौन हैं मनसा देवी ?

देवी मनसा को भगवान शंकर की पुत्री के रूप में पुराणों में मान्‍यता प्राप्‍त है. पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार, मां मनसा की शादी जगत्‍कारू से हुई थी और उनके पुत्र का नाम आस्तिक था. मनसा देवी को नागों के राजा वासुकी की बहन के रूप में भी जाना जाता है.

देवी को आदिशक्ति दुर्गा देवी का स्वरुप माना जाता है और नाम के अनुरूप हीं ये देवी मनोकामना पूर्ण करने वाली मानी जाती हैं. यहाँ एक वृक्ष पर मनोकामना पूर्ण होने के लिए सूत्र बाँधे जाने की मान्यता है. किन्तु मनोकामना पूर्ण होने पर सूत्र खोलना आवश्यक होता है.

पौराणिक कथाओं के आधार पर देवी की पूजा आदिवासियों द्वारा नागदेवी के रूप में की जाती थी. जिसके बाद समय के साथ साथ देवी की पूजा अन्य स्थलों पर होने लगी और लगभग 14वीं सताब्दी तक मनसा देवी को शिव परिवार के साथ मंदिरों में पूजा जाने लगा.

वहीं अभी भी कई जगहों पर मनसा देवी को लोग विष की देवी के रूप में पूजते है. विष की देवी के रूप में मुख्य रूप से बंगाल में पूजा जाता है.

पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसी मान्यता है कि इनके सात नामों जरत्कारू, जगतगौरी, मनसा, सियोगिनी, नाग्भागिनी, वैष्णवी,शैवी, नागेश्वरी, जगतकारुप्रिया, अस्तिकमाता और विषहरी का जाप करने से सर्प का भय नहीं रहता है.

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