आखिर क्या है ये Pegasus Spyware? क्या केंद्र ने पत्रकारों की करी जासूसी!

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भारत में पेगासस स्पाईवेयर (Pegasus Spyware) इनदिनों एक बार फिर चर्चाओं में हैं. दरअसल कई रिपोर्ट्स के मुता​बिक, एक वैश्विक सहयोगी जांच प्रोजेक्ट से पता चला है कि इजरायली कंपनी, एनएसओ ग्रुप के पेगासस स्पाइवेयर से भारत में 300 से अधिक मोबाइल नंबरों को टारगेट किया गया, जिसमें वर्तमान सरकार के दो मंत्री, तीन विपक्षी नेता, एक जज, कई पत्रकार और कई व्यवसाई शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक Pegasus स्पाईवेयर का प्रयोग टार्गेटेड फ़ोन नंबर की फोन टैपिंग के जरिये जासूसी की गई.

दावा किया जा रहा है कि जिन लोगों के फोन टैप किए गए उनमें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और प्रह्लाद सिंह पटेल, पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर सहित कई पत्रकार भी शामिल हैं. हालांकि, सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और रिपोर्ट जारी होने की टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े किए हैं. आइए आपको बताते हैं अब तक इस मामले में क्या-क्या हुआ और यह सॉफ्टवेयर दुनिया का सबसे खतरनाक स्पाईवेयर क्यों माना जाता है:

क्या है पेगासस?

Pegasus का अर्थ होता है उड़ने वाला घोड़ा. ये एक स्पाईवेयर है, यानी ऐसा सॉफ्टवेयर जिसका इस्तेमाल जासूसी में किया जा सके. सीधे शब्दों में कहें, तो यह सॉफ्टवेयर किसी भी फोन को हैक कर सकता है. इसे इसराइल की साइबर सुरक्षा कंपनी एनएसओ ने तैयार किया है, और बांगलादेश समेत कई देशों ने इसे खरीदा है. कंपनी का कहना है कि हम केवल सरकारों को सॉफ्टवेयर बेचते हैं और वह भी तब इसके जरिये किसी की जान बचानी हो. इसका आतंकवाद और अपराध के खिलाफ भी इस्तेमाल होता है. भारत के बारे में ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि सरकार ने एनएसओ से ‘पेगासस’ को खरीदा है या नहीं.

लेकिन इसके सरकारों द्वारा इसके दुरुपयोग के मामले भी सामने आते रहे हैं. मेक्सिको से लेकर सऊदी अरब की सरकार पर भी इसके गलत इस्तेमाल के आरोप लगाये जा चुके हैं. व्हाट्सऐप के स्वामित्व वाली कंपनी फेसबुक समेत कई दूसरी कंपनियों ने इस पर मुकदमे किए हैं. क्योंकि ये आसानी से उनसे सारे मैसेजेज पढ़ सकता है.

कैसे करता है काम?

ये एक ऐसा प्रोग्राम है जिसे अगर किसी स्मार्टफ़ोन फ़ोन में डाल दिया जाए, तो कोई हैकर उस स्मार्टफोन के माइक्रोफ़ोन, कैमरा, ऑडियो और टेक्सट मेसेज, ईमेल और लोकेशन तक की जानकारी हासिल कर सकता है. साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई की एक रिपोर्ट के अनुसार, पेगासस आपको एन्क्रिप्टेड ऑडियो सुनने और एन्क्रिप्टेड संदेशों को पढ़ने लायक बना देता है.

बतादे, एन्क्रिप्टेड ऐसे संदेश होते हैं जिसकी जानकारी सिर्फ मेसेज भेजने वाले और रिसीव करने वाले को होती है. जिस कंपनी के प्लेटफ़ॉर्म पर मेसेज भेजा जा रहा, वो भी उसे देख या सुन नहीं सकती. पेगासस के इस्तेमाल से हैक करने वाले को उस व्यक्ति के फ़ोन से जुड़ी सारी जानकारियां मिल सकती हैं.

कहां से आई रिपोर्ट?

लीक हुए आंकड़ों के आधार पर की गई एक वैश्विक मीडिया संघ की जांच के बाद इस बात के और सबूत मिले हैं कि इजराइल स्थित कंपनी ‘एनएसओ ग्रुप के सैन्य दर्जे के मालवेयर का इस्तेमाल पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक असंतुष्टों की जासूसी करने के लिए किया जा रहा है. पत्रकारिता संबंधी पेरिस स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘फॉरबिडन स्टोरीज एवं मानवाधिकार समूह ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा हासिल की गई और 16 समाचार संगठनों के साथ साझा की गई 50,000 से अधिक सेलफोन नंबरों की सूची से पत्रकारों ने 50 देशों में 1,000 से अधिक ऐसे व्यक्तियों की पहचान की है, जिन्हें एनएसओ के ग्राहकों ने संभावित निगरानी के लिए कथित तौर पर चुना.

वैश्विक मीडिया संघ के सदस्य ‘द वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, जिन लोगों को संभावित निगरानी के लिए चुना गया, उनमें 189 पत्रकार, 600 से अधिक नेता एवं सरकारी अधिकारी, कम से कम 65 व्यावसायिक अधिकारी, 85 मानवाधिकार कार्यकर्ता और कई राष्ट्राध्यक्ष शामिल हैं. ये पत्रकार ‘द एसोसिएटेड प्रेस (एपी), ‘रॉयटर, ‘सीएनएन, ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल, ‘ले मोंदे और ‘द फाइनेंशियल टाइम्स जैसे संगठनों के लिए काम करते हैं.

एनएसओ ग्रुप के स्पाइवेयर को मुख्य रूप से पश्चिम एशिया और मैक्सिको में लक्षित निगरानी के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोप हैं. सऊदी अरब को एनएसओ के ग्राहकों में से एक बताया जाता है. इसके अलावा सूची में फ्रांस, हंगरी, भारत, अजरबैजान, कजाकिस्तान और पाकिस्तान सहित कई देशों के फोन हैं. इस सूची में मैक्सिको के सर्वाधिक फोन नंबर हैं. इसमें मैक्सिको के 15,000 नंबर हैं.

भारत सरकार का पूरे मामले पर क्या कहना है?

सरकार ने कहा है कि लोगों पर सरकारी निगरानी के आरोपों का कोई ठोस आधार या इससे जुड़ा कोई सच नहीं है. पहले भी, भारत सरकार द्वारा वॉट्सऐप पर पेगासस के उपयोग के संबंध में इसी तरह के आरोप लगाए गए थे. उन रिपोर्टों का भी कोई तथ्यात्मक आधार नहीं था. तब इसका सभी पक्षों द्वारा स्पष्ट रूप से खंडन किया गया था, जिसमें भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में व्हाट्सएप के द्वारा किया गया खंडन भी शामिल था. इसी प्रकार, यह मीडिया रिपोर्ट भी भारतीय लोकतंत्र और इसकी संस्थाओं को बदनाम करने के लिए अनुमानों और अतिशयोक्ति पर आधारित प्रतीत होती है.

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