पैंटोमैथ पर सवाल: जिस कंपनी में ग्रुप फंड का पैसा, उसी का आईपीओ ला रहा ग्रुप का बैंक
मुंबई। मुंबई के इन्वेस्टमेंट बैंक पैंटोमैथ कैपिटल के कामकाज के तरीके पर सवाल उठ रहे हैं। एक हालिया खोजी रिपोर्ट के अनुसार, पैंटोमैथ ग्रुप के फंड पहले कंपनियों में निवेश करते हैं और बाद में ग्रुप का ही बैंक उन कंपनियों के शेयर आम निवेशकों को बेचता है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे तीन हालिया सौदों में ऑफर प्राइस पर शेयर खरीदने वाले निवेशक 42 से 65 प्रतिशत तक घाटे में हैं। यह सब कानूनी दायरे में हुआ है, और यही बात बाजार नियामक सेबी के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है।
हाई-टेक फ्लो का आईपीओ सेबी के पास
दिल्ली की पाइप निर्माता कंपनी हाई-टेक फ्लो सॉल्यूशंस ने पिछले महीने आईपीओ के लिए आवेदन किया है। पैंटोमैथ इस इश्यू के दो बैंकरों में से एक है। पैंटोमैथ ग्रुप के एक फंड के पास कंपनी की 14.67 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो उसने 19.74 रुपये प्रति शेयर पर खरीदी थी। यह फंड आईपीओ में अपने सभी 2.03 करोड़ शेयर बेच रहा है।
नियमों के तहत, ग्रुप फंड की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से ज्यादा होने के कारण पैंटोमैथ इस कंपनी का "एसोसिएट" माना जाता है। इसलिए वह आईपीओ का नेतृत्व नहीं कर सकता, केवल मार्केटिंग कर सकता है। फिर भी सेबी के नियमों के अनुसार उसे ड्यू-डिलिजेंस सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर करने होते हैं, यानी यह भरोसा देना होता है कि प्रॉस्पेक्टस सही है। यानी बैंक उस इश्यू की गारंटी देता है, जिसमें उसका सहयोगी फंड अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचकर निकल रहा है।
तीन सौदे, तीन कहानियां
हाई-टेक पाइप्स: अक्टूबर 2024 में बंसल परिवार की ही सूचीबद्ध कंपनी हाई-टेक पाइप्स ने 185.50 रुपये प्रति शेयर पर 500 करोड़ रुपये जुटाए थे। पैंटोमैथ इसका एकमात्र बैंकर था। इस प्लेसमेंट में पैंटोमैथ के ही एक फंड ने करीब 50 करोड़ रुपये के 27 लाख शेयर खरीदे। 21 सितंबर को यह शेयर 75 रुपये पर बंद हुआ, यानी करीब 60 प्रतिशत नीचे।
विक्रान इंजीनियरिंग: जनवरी 2024 में पैंटोमैथ के एक फंड ने इस पावर कॉन्ट्रैक्टर में लगभग 740 करोड़ रुपये के मूल्यांकन पर निवेश किया, जिसमें पैंटोमैथ कैपिटल ही बैंकर था। 19 महीने बाद पैंटोमैथ ने कंपनी का आईपीओ 1,781 करोड़ रुपये के मूल्यांकन पर को-लीड किया। रिटेल निवेशकों ने 97 रुपये प्रति शेयर चुकाए। लिस्टिंग के दो महीने बाद कंपनी ने 1,642 करोड़ रुपये के सोलर ऑर्डर की घोषणा की, जिससे शेयर उछला, लेकिन फरवरी तक ऑर्डर रद्द हो गया और आंतरिक ऑडिटरों ने इस्तीफा दे दिया। सितंबर 2025 से जून 2026 के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी 12.6 से घटकर 5.7 प्रतिशत रह गई, जबकि आम जनता की हिस्सेदारी 28.8 से बढ़कर 36.7 प्रतिशत हो गई। पैंटोमैथ का कहना है कि उसके फंड ने अपने शुरुआती निवेश का 5 प्रतिशत से भी कम हिस्सा बेचा है।
सार टेलीवेंचर: पैंटोमैथ ने 2023 में इस टेलीकॉम टावर कंपनी का 25 करोड़ रुपये से कम का आईपीओ कराया। आठ महीने बाद कंपनी के लिए फॉलो-ऑन ऑफर और राइट्स इश्यू के जरिए 450 करोड़ रुपये और जुटाए गए। मार्केट मेकर आसित सी मेहता की ब्रोकिंग शाखा थी, जिसमें पैंटोमैथ की एक कंपनी की हिस्सेदारी है। शेयर छह हफ्ते बाद 414 रुपये के शिखर पर पहुंचा और अब करीब 73 रुपये पर है। पैंटोमैथ के अनुसार उसका फंड अब भी पूरी हिस्सेदारी रखता है।
आंकड़े क्या कहते हैं
डेटा फर्म आईपीओ प्लेटफॉर्म के अनुसार, पैंटोमैथ के 123 आईपीओ में से करीब 90 प्रतिशत प्रीमियम पर लिस्ट हुए, लेकिन आधे से ज्यादा अब ऑफर प्राइस से नीचे कारोबार कर रहे हैं। पिछले आठ मेन-बोर्ड आईपीओ में से पांच घाटे में हैं। हालांकि छोटी कंपनियों के आईपीओ हर बैंकर के लिए जोखिम भरे होते हैं, और प्रतिद्वंद्वी बैंकों से इसकी तुलना सामने नहीं आई है।
पुराना रिकॉर्ड
2016 से 2020 के बीच पैंटोमैथ स्टॉक ब्रोकर्स, जिसके बोर्ड में लुनावत परिवार के सदस्य थे, ने 63 छोटी कंपनियों के आईपीओ में मार्केट मेकिंग की, और ये सभी आईपीओ पैंटोमैथ कैपिटल ने ही मैनेज किए थे। 2022 में सेबी ने पाया कि इस ब्रोकर ने निरीक्षण किए गए 37 में से 35 दिनों में ग्राहकों के 24 करोड़ रुपये तक के पैसे का दुरुपयोग किया। सेबी ने ब्रोकर पर 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। लुनावत परिवार का कहना है कि वह 2019 तक इस ब्रोकर से अलग हो चुका था। 2023 में सेबी के एक अलग निरीक्षण में पैंटोमैथ कैपिटल के दो ड्यू-डिलिजेंस सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षरों में अंतर पाया गया था, हालांकि 2024 में यह आरोप बिना किसी फैसले के हटा दिया गया।
पैंटोमैथ का पक्ष
पैंटोमैथ ने लिखित जवाब में कहा कि उसका हर कारोबार अलग से सेबी में पंजीकृत है और उसका अपना बोर्ड है। कंपनी के मुताबिक, न्यूयॉर्क और लंदन में ऐसे एकीकृत समूह आम हैं, और ग्रुप फंड की किसी कंपनी में हिस्सेदारी होना अपने आप में हितों का टकराव नहीं है। उसने कहा कि हर हिस्सेदारी तय सीमा के भीतर थी और उसका खुलासा किया गया था।
आगे क्या
अमेरिका में अगर किसी बैंक के सहयोगियों के पास इश्यूअर की 10 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सेदारी हो, तो इसका प्रमुखता से खुलासा करना होता है और अक्सर कीमत की पुष्टि के लिए एक स्वतंत्र अंडरराइटर जरूरी होता है। भारत में सेबी ने पिछले दिसंबर में उन आईपीओ का नेतृत्व करने से बैंकरों को रोक दिया था, जिनमें उनके निदेशकों या कर्मचारियों की 0.1 प्रतिशत हिस्सेदारी भी हो। लेकिन सहयोगी फंड 14.67 प्रतिशत हिस्सेदारी रखकर पूरी बेच सकता है। ऐसे में हाई-टेक फ्लो का आईपीओ सेबी के लिए यह तय करने का मौका है कि क्या मौजूदा नियम ग्रुप-स्तर के हितों के टकराव को पकड़ने के लिए काफी हैं।