79वें स्वतंत्रता दिवस पर सद्गुरु का संदेश: भारत को चाहिए सच्ची मुक्ति, सिर्फ उदारीकरण नहीं
सद्गुरु: भारत अपनी स्वतंत्रता के 79वें वर्ष का जश्न मना रहा है। इस मौके पर संप्रभुता और आज़ादी के वास्तविक अर्थ पर विचार करना बेहद ज़रूरी हो जाता है। आज हमारे सामने चुनौतियों की एक लंबी सूची है — वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, राजनीतिक अलगाव, आंतरिक स्तर पर धर्म, जाति और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े विवाद, और युवाओं में बढ़ते मानसिक स्वास्थ्य संकट।
लेकिन जिन राष्ट्रों में हिम्मत होती है, जिनके नेतृत्व में साहस होता है, उनके लिए चुनौतियां बाधा नहीं बल्कि विकास का ईंधन बनती हैं। आज देश में ऊर्जा और आत्मविश्वास का माहौल स्पष्ट महसूस किया जा सकता है।
अब वक्त आ गया है कि हम सिर्फ उदारीकरण (Liberalization) पर न रुकें, बल्कि मुक्ति (Liberation) की ओर बढ़ें। शिक्षा, उद्योग, तकनीक और बुनियादी ढांचे को सरकारी नियंत्रण से आज़ाद किया जाए ताकि व्यक्तिगत पहल और रचनात्मकता पनप सके, और मानव बुद्धि की उड़ान किसी भी वास्तविक या काल्पनिक सीमा को तोड़ सके।
As India celebrates its 79th year of independence, the vibrancy in the air is undeniable, and the optimism and growing self-assurance are palpable. The time has come not merely to liberalize, but liberate. What we now need is a burst of free enterprise – bold, confident and… pic.twitter.com/VC4T2KC2sO
— Sadhguru (@SadhguruJV) August 15, 2025
निजी क्षेत्र और निवेशकों के लिए माहौल तैयार करना
अगर हमें एक मजबूत निजी क्षेत्र चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में आकर्षित करना है, तो हमें ऐसा माहौल बनाना होगा जो कारोबार और विदेशी निवेश के लिए अनुकूल हो। हमें उस औपनिवेशिक मानसिकता को त्यागना होगा जिसने हमें केवल जीवित रहने की मानसिकता में बांध दिया था। सड़कें, पुल, विश्वविद्यालय और अन्य सार्वजनिक ढांचे बनाने का अवसर सिर्फ सरकार तक सीमित न रहे — आम नागरिकों को भी इसमें योगदान का अवसर मिले।
बदलाव में थोड़ी अव्यवस्था ज़रूरी है
जब लोग बड़े सपने देखते हैं और देश निर्माण में लगते हैं, तो कुछ नियम टूट सकते हैं, कुछ पुराने कानून बदलने पड़ सकते हैं, और कुछ जर्जर प्रशासनिक ढांचे हटाने पड़ सकते हैं। यह अव्यवस्था ही बदलाव का हिस्सा है। हमें बुनियादी नियम तय करके व्यक्तियों पर भरोसा करना चाहिए और लालफीताशाही में नवाचार को दम घुटने से बचाना चाहिए।
तकनीक और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता
आईटी हमारी ताकत है और हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में वैश्विक खिलाड़ी बन रहे हैं। इस बढ़त को किसी बाहरी ताकत के दबाव में नष्ट नहीं होने देना चाहिए। AI को मजबूत डेटा सेंटर की ज़रूरत होती है, जिसके लिए बिजली आपूर्ति अनिवार्य है। केवल राज्य सरकारों की बिजली पर निर्भर रहने के बजाय हमें मिनी न्यूक्लियर स्टेशन (Small Modular Reactors) जैसी तकनीक में निवेश करना होगा।
शिक्षा का असली उद्देश्य
अगर शिक्षा इंसान को रूपांतरित नहीं करती तो उसका कोई मतलब नहीं। हमें युवाओं में बचपन से ही नवाचार की भावना जगानी होगी ताकि उनका स्वतंत्र सोचने का जज़्बा खत्म न हो। इसके लिए शिक्षा को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त कर मानसिक लचीलापन और शारीरिक क्षमता पर आधारित बनाना होगा।
अंतरराष्ट्रीय संबंध और सहयोग
अब समय है कि हम भौगोलिक रूप से अनुकूल देशों के साथ गठबंधन गहराएं और ताकतवर राष्ट्रों की दबंग नीतियों का सामना करें। हमें दीवारें नहीं, बल्कि खिड़कियां खोलनी हैं ताकि लोगों के बीच आदान-प्रदान और सहयोग बढ़े।
भारत की सांस्कृतिक पहचान
भारत की सबसे बड़ी पहचान यह रही है कि हम आस्था के आधार पर विभाजित नहीं, बल्कि खोज की संस्कृति वाले लोग हैं। हमें ऐसे बच्चों को बढ़ावा देना चाहिए जो स्वतंत्र और जागरूक हों, न कि कट्टर सोच में बंधे हुए।
आत्मनिर्भर राष्ट्र की ओर
भारत अब नवयुवक की तरह है — जोखिम लेने और नई संस्थाएं बनाने के लिए तैयार। पहले जो संरक्षणवाद काम आया, वह अब प्रगति में बाधा बन रहा है। अब समय है कि भारतीय खुद अपने भविष्य की बागडोर संभालें। चुनौती कोई रुकावट नहीं, बल्कि ऊर्जा है। इसलिए, अब वक्त है सिर्फ उदारीकरण नहीं, बल्कि सच्ची मुक्ति का।