एक प्रधानमंत्री जिन्हें 27 करोड़ 10 लाख लोगों को ग़रीबी रेखा से ऊपर लाने में सफलता मिली

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मनमोहन सिंह के लिए उदारीकरण अर्थव्यवस्था का एक मॉडल था. वो किसी कॉर्पोरेट के साथ देश लूटने की दुरभिसंधि नहीं थी. इसलिए वो उसको लागू करने के मामले में एक अर्थशास्त्री की तरह सचेत थे. उन्होंने किसी कॉर्पोरेट की अंधाधुंध फंडिंग पर ख़ुद को प्रधानमंत्री पद के लिए प्रमोट नहीं किया था. उसके अकूत संसाधनों का उपयोग मीडिया को ख़रीदकर माहौल बनाने के लिए नहीं किया था.

करोड़ों रुपये के स्टेज बनाकर उनसे अपने ग्रैंड इवेंट्स मैनेज नहीं कराये थे. अमेरिकन मॉडल पर पीआर टीम हायर करके ख़ुद को महामानव बनाने के लिए उन्होंने किसी कॉर्पोरेट के खुट्टे नहीं थामे थे. कॉर्पोरेट कांग्रेस को चन्दा देते थे लेकिन कांग्रेस ने उनकी तिजोरी में अपना ज़मीर गिरवीं नहीं रख छोड़ा था.

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इसलिए अपने कार्यकाल के दस सालों में वो भारत की ग़रीबी अप्रत्याशित रूप से घटाने में सफल रहे थे. और उनकी इस उपलब्धि को यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) और ऑक्सफ़ोर्ड पावर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) ने उद्घाटित किया था. यह वो समय है जब सोनिया गाँधी के नेतृत्व में नेशनल एडवाइजरी कमिटी देश के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए एक के बाद एक कल्याणकारी योजनाओं का ख़ाका तैयार करने में जुटी थी.

इस रिपोर्ट ने कहा था कि भारत ने अपनी ग़रीबी की दर 2005-6 से 2015-16 के बीच 55 प्रतिशत से घटाकर 28 प्रतिशत करने में सफलता हासिल की है. और, इस दौरान मनमोहन सिंह सरकार को 27 करोड़ 10 लाख लोगों को ग़रीबी रेखा से ऊपर लाने में सफलता मिली थी.

आम ग़रीब जनता के पक्ष में काम करने की सजा के तौर पर देश के कुछ कॉर्पोरेट घरानों ने कांग्रेस के खिलाफ़ माहौल बनाने के लिए नरेंद्र मोदी के प्रोजेक्ट पर पैसा लगाया. यह भी बताना ज़रूरी है कि यह वो ही समय है जब पहले आडवाणीजी और फिर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में समूची भाजपा मनमोहन सिंह और उनकी सरकार की खिल्ली उड़ाने में जुटी थी.

इसके अलावा वो चेहरे भी याद रखिये जो सिविल सोसाइटी के नाम पर परदे पर उतारे गए थे जिनमें से कुछ ने पीछे खींचे जाने पर नेपथ्य में जाने से इनकार कर दिया था. इसलिए ऊपर जो कुछ मनमोहन सिंह के बारे में लिखा गया है उसे एकदम उलटकर नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए पढ़िए.

पिछले छः सालों में जनता के पैसे की कॉर्पोरेट लूट और पूँजीपतियों के लाखों करोड़ रुपये के कर्जों की माफ़ी और अब भारतीय कृषि को कॉर्पोरेट बाज़ार में तब्दील कर देना दरअसल मोदीजी द्वारा इसी अहसान को चुकाने की कवायद है. मोदीजी के लिए देश का मतलब अम्बानी और अडानी की जागीरें हैं जिन्हें किसान, मजदूर और भारतीय मध्य वर्ग के खून-पसीने से सींचना है.

भारतीय खुदरा बाज़ार से लेकर भारतीय खेतिहर अर्थव्यवस्था तक वो सारी जागीरें मोदीजी से अम्बानी और अडानी ने माँग ली हैं और मोदीजी में इतना नैतिक साहस नहीं है कि वो उनको ना कह सकें.

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