IL&FS Fraud Case: क्यों कहा जाता है इसे स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला?

 

इंफ्रास्ट्रक्चर लीज़िंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (IL&FS) का मामला आज भी भारतीय कॉरपोरेट इतिहास का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला माना जाता है। एक समय पर यह कंपनी देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में गिनी जाती थी। HDFC, UTI, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया जैसे संस्थान इसके शुरुआती प्रमोटर थे और बाद में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने भी इसमें बड़ी हिस्सेदारी ली।

लेकिन 2018 में अचानक IL&FS समूह की कई कंपनियों के डिफॉल्ट करने से लगभग 91,000 करोड़ रुपये के कर्ज संकट का खुलासा हुआ। यह घटना न केवल निवेशकों और बैंकों को हिला गई, बल्कि इससे पूरे NBFC सेक्टर में तरलता संकट (Liquidity Crisis) पैदा हो गया।

डायरेक्टर्स और टॉप मैनेजमेंट की भूमिका

ग्रांट थॉर्नटन की अंतरिम ऑडिट रिपोर्ट और SFIO (Serious Fraud Investigation Office) की जाँच में सामने आया कि कंपनी के टॉप मैनेजमेंट और डायरेक्टर्स ने हितों का टकराव (Conflict of Interest) पैदा किया और लोन का दुरुपयोग निजी लाभ के लिए किया।

WhatsApp Group Join Now

सिद्धार्थ दिनेश मेहता, जो Bay Capital समूह के प्रमोटर थे, उसी समय IL&FS Energy Development Company Ltd. के डायरेक्टर भी थे। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी स्थिति में मंजूर किए गए लोन निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े करते हैं।

ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि कई बार लोन की रकम उस उद्देश्य में इस्तेमाल ही नहीं हुई, जिसके लिए वह स्वीकृत की गई थी।

IL&FS का बोर्ड साधारण नहीं था। इसमें कॉरपोरेट जगत के दिग्गज शामिल थे:

  • आर.सी. भार्गव (Maruti Suzuki के चेयरमैन),
  • केकी मिस्त्री (HDFC के वाइस-चेयरमैन और CEO),
  • सुनील बी माथुर,
  • माइकल पिंटो,
  • जयहर्त राव (Jerry Rao) जैसे प्रतिष्ठित नाम।

इसके बावजूद, वित्तीय स्टेटमेंट्स में हेरफेर (Window Dressing), रेटिंग एजेंसियों को प्रभावित करने और ऑडिट की नाकामी जैसी गंभीर खामियाँ सामने आईं।

सरकार का हस्तक्षेप

डिफॉल्ट संकट के बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के आदेश से IL&FS का पुराना बोर्ड भंग कर दिया। इसके स्थान पर उदय कोटक (MD & CEO, Kotak Mahindra Bank) की अगुवाई में छह सदस्यीय नया बोर्ड नियुक्त किया गया। इस कदम का उद्देश्य कंपनी को दिवालिया होने से बचाना और कर्जदाताओं की रकम को सुरक्षित करना था।

असर और परिणाम

  • IL&FS पर 91,000 करोड़ रुपये से अधिक की दीर्घकालिक देनदारियाँ थीं।
  • LIC (25.34%) और SBI (6.42%) जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के दिग्गज निवेशक भी प्रभावित हुए।
  • इस घोटाले ने भारतीय पूंजी बाज़ार को गहरा झटका दिया और NBFC सेक्टर में विश्वास संकट खड़ा कर दिया।
  • इससे यह सवाल भी उठा कि इतनी बड़ी कंपनी, AAA रेटिंग और शीर्ष ऑडिट फर्म की मौजूदगी के बावजूद नियामक तंत्र कैसे विफल हो गया।

क्यों है इसे "स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा घोटाला"?

  • इसमें शामिल थे देश के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थान।
  • बोर्ड में बैठे थे कॉरपोरेट दिग्गज और अनुभवी प्रोफेशनल्स।
  • फिर भी हुआ हजारों करोड़ का घपला, जिसे रोकने में ऑडिटर्स, रेटिंग एजेंसियाँ और नियामक सभी नाकाम साबित हुए।

यह घोटाला हमें सिखाता है कि कॉरपोरेट गवर्नेंस और डायरेक्टर्स की जवाबदेही केवल नाममात्र की औपचारिकता नहीं, बल्कि देश की आर्थिक स्थिरता के लिए बुनियादी आवश्यकता है।

Tags

Share this story