जन्माष्टमी पर Sounds of Isha ने पेश किया मीरा की भक्ति को समर्पित गीत
जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और उनकी अनन्य भक्ति की याद दिलाता है। इस अवसर पर राजस्थान की 16वीं सदी की संत कवयित्री मीरा बाई की अमर भक्ति एक बार फिर जीवंत हो उठी है। मीरा ने कृष्ण को केवल भगवान नहीं, बल्कि अपने शाश्वत प्रियतम के रूप में देखा।
राजघराने में जन्म लेने के बावजूद उनका हृदय राजसुख में नहीं, बल्कि कृष्ण भक्ति में रमा रहा। कहा जाता है कि बचपन से ही मीरा कृष्ण से मित्र और प्रियतम की तरह संवाद करती थीं। उनकी भक्ति ने समाज की परंपराओं और बंधनों को तोड़ दिया और एक ऐसी साधना को जन्म दिया, जिसने उन्हें अमर बना दिया।
इस जन्माष्टमी, Sounds of Isha ने "मीरा" नामक एक मधुर रचना प्रस्तुत की है। यह गीत मीरा की उस तड़प और समर्पण को श्रोताओं तक पहुंचाता है, जिसे उन्होंने सदियों पहले अपने पदों में गाया था। गीत की पंक्तियाँ मीरा के वियोग की वेदना व्यक्त करती हैं, जैसे मछली पानी के बिना जीवित नहीं रह सकती।
मीरा कहती हैं — “वैद्य मेरे दुख को नहीं समझ सकते, यह देह का नहीं आत्मा का घाव है; यह तो कृष्ण के दर्शन की तड़प है।”
गीत की मधुरता और आंतरिक भावनाएं श्रोताओं को उसी भक्ति की दुनिया में ले जाती हैं, जहाँ मीरा ने कृष्ण के लिए अपनी पूरी आत्मा समर्पित कर दी थी।
आज जब जन्माष्टमी पर दीप प्रज्वलित हों और मंदिरों में भक्ति-गीत गूंजें, तब "मीरा" का यह संगीत हमें याद दिलाता है कि मीरा का प्रेम केवल उनके लिए नहीं था, बल्कि उन सभी के लिए है जिनका हृदय दिव्य प्रेम की धड़कन महसूस करता है।