विश्व पर्यावरण दिवस: पेड़ आधारित खेती से किसान की आय ₹30,000 से बढ़कर ₹3 लाख प्रति एकड़ हुई

 
कावेरी कॉलिंग

नई दिल्ली, 5 जून: विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग अभियान ने सरकार से पेड़ आधारित खेती (ट्री-बेस्ड एग्रीकल्चर) को बढ़ावा देने के लिए किसान हितैषी नीतियां और प्रोत्साहन देने की अपील की है। अभियान का कहना है कि यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद कर सकता है।

सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आनंद एथिराजालु ने कहा कि पेड़ आधारित खेती पर्यावरण की समस्या का आर्थिक समाधान है। उनका कहना है कि इस मॉडल से मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है, नदियों के जल प्रवाह को सहारा मिलता है और किसानों की आय में 300 से 800 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है।

WhatsApp Group Join Now

पेड़ आधारित खेती

इसका एक उदाहरण तमिलनाडु के पोलाची के किसान वल्लुवन हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र से भी सम्मान मिल चुका है। उन्होंने अपने नारियल आधारित पारंपरिक खेत को पेड़ आधारित खेती और बहुफसली मॉडल में बदल दिया।

वर्ष 2009 में उन्होंने केवल नारियल की खेती छोड़कर कई तरह की फसलें उगाना शुरू किया। आज उनके खेत में नारियल के साथ जायफल, केले की सात किस्में, सुपारी, करी पत्ता, हल्दी, हाथी सूरन और कई फलदार पेड़ लगाए गए हैं।

वल्लुवन बताते हैं कि पहले उन्हें प्रति एकड़ सालाना केवल ₹30,000 की आय होती थी। कई बार नारियल की खेती में नुकसान भी उठाना पड़ता था। लेकिन अब पेड़ आधारित खेती और प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाने के बाद उनकी आय बढ़कर ₹2.5 लाख से ₹3 लाख प्रति एकड़ सालाना हो गई है।

साल 2017 के गंभीर सूखे के दौरान भी उनका खेत सुरक्षित रहा। उन्होंने मल्चिंग, कवर क्रॉपिंग और वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया, जिससे मिट्टी में नमी बनी रही और मिट्टी का कटाव भी नहीं हुआ।

उनके खेत की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर लगभग 0.52 प्रतिशत से बढ़कर 3.36 प्रतिशत तक पहुंच गया है। वहीं नारियल का उत्पादन भी बढ़ा है। पहले एक पेड़ से करीब 100 नारियल मिलते थे, जो अब बढ़कर लगभग 160 हो गए हैं।

कावेरी कॉलिंग अभियान, जिसे सद्गुरु ने शुरू किया था, का लक्ष्य कावेरी बेसिन क्षेत्र में किसानों की जमीन पर 242 करोड़ पेड़ लगाने में सहयोग करना है। अभियान के अनुसार अब तक 13.4 करोड़ पेड़ लगाए जा चुके हैं और 2.6 लाख किसानों को पेड़ आधारित खेती अपनाने में सहायता मिली है।

इस अभियान के तहत किसानों को पौधे उपलब्ध कराने और खेती संबंधी सलाह देने का काम भी किया जाता है। तमिलनाडु के कडलूर में एशिया की सबसे बड़ी एकल-स्थल नर्सरी संचालित की जा रही है, जिसे 200 से अधिक महिलाएं संभालती हैं। यहां हर साल 85 लाख पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा तिरुवन्नामलाई में भी एक नर्सरी है, जहां 15 लाख पौधे तैयार होते हैं।

अभियान के ऑपरेशंस लीड तमिझमारन के अनुसार, तमिलनाडु और कर्नाटक में कुल 53 वितरण केंद्रों के जरिए किसानों तक पौधे पहुंचाए जाते हैं। किसानों को 54 तरह के पौधों में से चुनने का विकल्प मिलता है, जिनमें सागौन, लाल चंदन, रोजवुड और महोगनी जैसी मूल्यवान प्रजातियां भी शामिल हैं।

सेव सॉइल अभियान

किसानों की मदद के लिए 200 से अधिक फील्ड अधिकारी काम कर रहे हैं। वर्ष 2025 में अब तक 26,500 से अधिक खेतों का दौरा कर किसानों को मुफ्त सलाह दी गई है।

कावेरी कॉलिंग के कम्युनिकेशन एंड रिलेशनशिप्स मैनेजर रुशभ देसादला के अनुसार, किसानों को मिट्टी, पानी और स्थानीय जलवायु के आधार पर उपयुक्त पौधों और खेती की सलाह दी जाती है।

अभियान किसानों तक पहुंच बनाने के लिए किसान उत्पादक संगठनों (FPO), कृषि विज्ञान केंद्रों, ग्राम पंचायतों और कृषि मेलों के साथ भी काम कर रहा है। वर्तमान में 60,000 से अधिक किसान 225 व्हाट्सएप समूहों के जरिए लगातार मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे हैं।

इसके अलावा, सेव सॉइल रीजेनेरेटिव रिवोल्यूशन (SS-RR) कार्यक्रम के तहत 31 मार्च 2026 तक 532 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं, जिनसे 40,311 किसानों को प्रशिक्षण मिला है। वहीं 54,982 किसानों को डिजिटल सहायता नेटवर्क से जोड़ा गया है।

पिछले तीन वर्षों में 185 किसानों ने तीन महीने की इंटर्नशिप पूरी की है। अभियान ने कृषि से जुड़े 1,260 तकनीकी वीडियो भी तैयार किए हैं, जिन्हें विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कुल 29.6 करोड़ से अधिक बार देखा जा चुका है।

अभियान का कहना है कि मिट्टी की सेहत, किसानों की आय और ग्रामीण क्षेत्रों की मजबूती के लिए पेड़ आधारित खेती और प्राकृतिक खेती जैसे मॉडल भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

Tags

Share this story