द्रौपदी के चीर हरण की कहानी...जानिए

 
द्रौपदी के चीर हरण की कहानी...जानिए

द्रौपदी चीर हरण महाभारत काल की सबसे ज़्यादा निंदनीय घटना है. महाभारत हिंदुओं का पौराणिक महाकाव्य है. इसे पंचवेद भी माना जाता है. इस महाकाव्य में अन्य छोटी-बड़ी शिक्षाप्रद घटनाओं की चर्चा की गई है. इनमें से एक घटना द्रौपदी चीर हरण भी है. आइए जानते हैं महाभारत महाकाव्य की शर्मनाक घटना के बारे में जिसका नाम द्रौपदी चीर हरण है.

द्रौपदी

द्रौपदी महाभारत काव्य की सबसे प्रसिद्ध पात्रों में से एक हैं. महाभारत काव्य के अनुसार द्रौपदी पांचाल देश की राजकुमारी और राजा द्रुपद की पुत्री है. द्रौपदी को चीर-कुमारी भी कहा जाता है. इनका विवाह महाराज पांडु और रानी कुंती के पुत्र अर्जुन से हुआ था. अर्जुन ने मछली की आंख में तीर भेद कर उनके साथ स्वयंवर रचाया था. मां कुंती के अनजाने आदेश के कारण उनकों पांचो पांडव यानी अर्जुन के पांच भाइयों की पत्नी बन कर रहना पड़ा.

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चीर हरण कहानी

एक समय की बात है जब पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर का इंद्रप्रस्थ नगर पर राज्य था. तब उस समय हस्तिनापुर के राजकुमार दुर्योधन थे. जो पांडवों के चचेरे भाई थे. दुर्योधन अपने चचेरे भाइयों यानी पांडवों से बहुत ईर्ष्या करता था. हस्तिनापुर का राजकुमार दुर्योधन अपने चालाक मामा शकुनि की प्रत्येक बात मानता था.

एक दिन मामा शकुनि ने अपने भांजे दुर्योधन को सलाह दी कि वह अपने भाइयों यानि पांडवों को जुआ के खेल में आमंत्रित करें. दुर्योधन ने ऐसा ही किया. दुर्योधन का बुलावा स्वीकार कर पांडव सभा में उपस्थित हुए. सभा में भरत वंश के राजा धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, विदुर जैसे अनेक महान लोग सभा में उपस्थित हुए. खेल शुरू होने पर मामा शकुनि ने छल कपट से पांडवों को हराना शुरू कर दिया. इस खेल में पांडव अपना राज्य और पांचों भाइयों को दांव पर लगाकर जुआ हार गये. जब पांडवों के पास कुछ नहीं बचा, तो पांडवों ने अपनी पत्नी द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया. घमंडी दुर्योधन इसी समय का इंतजार कर रहा था. उसने मामा शकुनि की सहायता से द्रौपदी को भी जीत लिया.

इसके बाद दुशासन द्वारा द्रौपदी को सभा में बुलाया गया. उनके के मना करने पर दुशासन ने उन्हें बाल पकड़कर सभा में घसीटते हुए लेकर आया. उसके बाद दुर्योधन का आदेश था कि द्रौपदी को भरी सभा में निर्वस्त्र कर दिया जाए. जैसे ही दुशासन ने इस कुकर्म करने के लिए हाथ बढ़ाया, द्रोपदी ज़ोर से चीखी और भगवान कृष्ण को पुकारने लगे. भगवान ने जब उनकी की करुण पुकार सुनी, तो वे उनकी सहायता के लिए पहुंच गए. दुशासन जितनी साड़ी (चीर) खींचता गया, भगवान की कृपा दृष्टि से साड़ी उतनी ही बढ़ती गयी. अंत में दुशासन थक गया. महाभारत में इसी कथा को 'द्रोपदी चीर हरण' नाम दिया गया है. यह चीर हरण महाभारत युद्ध का सबसे बड़ा कारण माना जाता है.

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