द्रविड़ और लॉर्ड्स: जब एक मैच ने राहुल को दीवार बनाया था

Rahul Dravid The wall indian cricket team
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22 जून 1996, क्रिकेट का मक्का यानी लॉर्ड्स आज अपनी ऐतिहासिक बालकनी से 23 साल के एक युवा क्रिकेटर को 22 गज की पिच की ओर जाते हुए देख रहा था। बीते हुए कई सालों में इस बालकनी ने ना जाने कितने क्रिकेटरो को आते जाते देखा था, मगर इस बालकनी को क्या पता था कि आज यह भविष्य में बनने वाली दीवार को देख रही है।

1996 के भारत के इंग्लैंड दौरे की शुरुआत काफी खराब रही थी। पहला टेस्ट टीम आठ विकेट से हार चुकी थी। दूसरे टेस्ट की शुरुआत भारत ने अच्छी की थी मगर जैसे-जैसे मैच बढ़ता गया वैसे-वैसे भारतीय टीम की पकड़ मैच से छूटती गयी। इंग्लैंड के 344 रनों के जवाब में भारतीय टीम ने अपने 5 विकेट 202 रनों पर खो दिए थे। क्रीज पर मौजूद थे डेब्युटेंट सौरव गांगुली जो कि अपनी बाएं हाथ की बल्लेबाजी से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन कर रहे थे। उनका साथ निभाने आए राहुल शरद द्रविड़। अंग्रेजी टीम के मन में एक और जीत के साथ सीरीज जीतने का ख्याल था। मगर इन दोनों डेब्युटेंट खिलाड़ियों के विचार कुछ अलग ही थे।

राहुल जब क्रीज पर आ रहे थे तो उनके मन में सचिन तेंदुलकर के शब्द गूंज रहे थे, “बस 15 मिनट क्रीज पर बिताओ और चीजें अपने आप आसान होने लगेंगी”। राहुल ने बिल्कुल यही किया। पहले 15 मिनट गेंद को देख परखने के बाद राहुल द्रविड़ ने तेज गेंदबाज कॉर्क की एक गेंद को कवर ड्राइव के जरिए बाउंड्री लाइन के बाहर भेजा।

एक ओर जहां राहुल धीरे-धीरे हर एक गेंद को परख के खेल रहे थे, वही दूसरे छोर पर उनके साथी बल्लेबाज सौरव गांगुली चौको की झड़ी लगा रहे थे। 131 रनों की अपनी पारी में गांगुली ने 20 चौके लगाए थे। गांगुली का विकेट जब गिरा तब भारत इंग्लैंड के स्कोर से 48 रन पीछे था। बेशक गांगुली ने अपने पहले ही टेस्ट में शतक जड़कर अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया था, मगर काम अभी भी अधूरा था। दिन का खेल समाप्त होने तक भारत का स्कोर 324 पर छह था और राहुल 56 रनों पर नाबाद।

चौथा दिन – 23 जून 1996, चौथे दिन का खेल शुरू होने के साथ ही लोगों के मन में यही सवाल उठ रहा था कि कितनी बार क्रिकेट इतिहास में दो डेब्युटेंटो ने एक साथ शतक जड़ा है। इन सब बातों से बेखबर राहुल निचले क्रम के बल्लेबाजों के साथ अपनी और भारत की पारी को आगे बढ़ाते जा रहे थे। जब राहुल अपने शतक और हर बल्लेबाज का सपना यानी लॉर्ड्स के मैदान पर शतक से मात्र 5 रन दूर थे तभी क्रिस लुइस की एक बाहर निकलती हुई गेंद पर वह एज दे बैठे।

विकेट कीपर के लिए यह एक रेगुलेशन कैच था। एज लगने के बाद राहुल ने बस एक बार पलट कर विकेटकीपर को देखा और अंपायर के उंगली उठाने से पहले ही सीधा पवेलियन की ओर चल दिये। 23 जून 1996 को शुरू हुआ यह सफर काफी खूबसूरत रहा। मगर वह बचे हुए 5 रन राहुल के जहन में बस गए थे।

15 साल बाद, 2011 मे जब भारतीय टीम इंग्लैंड का दौरा करने पहुँची तब राहुल को भी पता था कि इंग्लैंड की सरजमीं पर यह उनकी आखिरी सीरीज होने वाली है। पहला टेस्ट लॉर्ड्स के मैदान पर खेला गया जिसकी कहानी भी उस 1996 के टेस्ट की तरह ही थी। शुरुआती सफलताओं के बाद भारत ने मैच से अपनी पकड़ गवा दी। इंग्लैंड ने 474 का विशालकाय स्कोर खड़ा कर दिया।

इस पहाड़ पर चढ़ाई करते हुए टीम इंडिया को सधी हुई शुरुआत मिली। पहला विकेट गिरने के बाद राहुल बल्लेबाजी करने आए। एक ओर जहां राहुल ने सधी हुई बल्लेबाजी करने के साथ-साथ कई आकर्षक स्ट्रोक भी लगाएं तो वहीं दूसरी ओर भारतीय टीम के बल्लेबाज अंग्रेजी गेंदबाजों के सामने घुटने टेकते हुए नजर आए। 276 रनों तक पहुंचते-पहुंचते भारतीय टीम ने अपने 8 विकेट खो दिए थे।

द्रविड़ 94 रनों पर नाबाद थे, 5 रन की वह कसक अब मात्र 6 रन दूर थी, लेकिन सामने स्टुअर्ट ब्रॉड, जेम्स एंडरसन और क्रिस ट्रेमलेट की धारदार गेंदबाजी को मात्र दो अच्छी गेंदों की जरूरत थी। द्रविड़ भी समय की गंभीरता को समझ चुके थे,

• चौथी गेंद में ट्रेमलेट ने वही किया जो कोई भी आम बॉलर करता, गेंद को फुल और स्ट्रेट रखकर बल्लेबाज को खेलने को मजबूर किया, मगर इन सब पैतरों को द्रविड़ पिछले 15 सालों से देखते आ रहे थे, सीधे बल्ले के साथ डिफेंस, कोई रन नहीं।

• ओवर की पांचवी गेंद वह पल लेकर आई जिसका इंतजार राहुल पिछले 15 सालों से कर रहे थे। मिड विकेट की ओर पुश, 2 रन। दूसरा रन खत्म करने के साथ ही राहुल ने हवा में अपना पंच लहराया। यह उस आदमी की खुशी का इजहार था जिसने इसी सपने के लिए क्रिकेट खेला था। जो आज ठीक 15 साल एक महीने बाद 23 जुलाई 2011 को उसी सपने को जी रहा था।

जब पूरी भारतीय टीम आउट होकर पवेलियन में बैठी थी तब एक दीवार 22 गज की पट्टी पर अपनी टीम और हार के बीच में खड़ी थी, चारों तरफ तालियों की गड़गड़ाहट के अलावा कुछ सुनाई नही दे रहा था और ना ही कोई कुछ सुनना चाहता था।

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