Supreme Court ने खारिज की E20 पेट्रोल पर याचिका, केंद्र बोला– बाहरवाले नहीं तय करेंगे भारत का ईंधन
भारत सरकार के E20 पेट्रोल मिश्रण कार्यक्रम (20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल) को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि देश की ईंधन नीति पर बाहरी ताकतें फैसला नहीं कर सकतीं।
दरअसल, एक याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि 2023 से पहले निर्मित वाहनों पर E20 पेट्रोल का असर पड़ेगा और उनकी ईंधन दक्षता लगभग छह प्रतिशत तक घट सकती है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि सरकार को कम से कम E10 पेट्रोल उपलब्ध कराना चाहिए ताकि पुराने वाहनों के मालिकों को विकल्प मिल सके। सुनवाई के दौरान उन्होंने 2021 की नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला भी दिया, जिसमें पुराने वाहनों की क्षमता पर चिंता जताई गई थी।
हालांकि, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता "बाहर का व्यक्ति" है और "नामधारी" बनकर एक बड़ी लॉबी के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। उन्होंने साफ कहा कि E20 योजना न केवल प्रदूषण कम करेगी बल्कि कच्चे तेल के आयात पर होने वाला खर्च घटाएगी और किसानों—विशेषकर गन्ना उत्पादकों—को भी बड़ा लाभ देगी।
केंद्र सरकार का तर्क है कि E20 पेट्रोल से न केवल प्रदूषण घटेगा बल्कि वाहनों की राइड क्वालिटी और एक्सेलेरेशन भी बेहतर होगा। सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2025–26 तक पूरे देश में बेचे जाने वाले पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाया जाए।
वहीं, वाहन मालिकों और ऑटो एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह मिश्रण पुराने इंजनों की परफॉर्मेंस को प्रभावित कर सकता है और वाहनों की आयु कम कर सकता है। इसके बावजूद अदालत ने साफ किया कि भारत की ऊर्जा नीतियां देश की ज़रूरतों और हितों के आधार पर तय होंगी, न कि बाहरी दबाव पर।