यूपी की राजनीति में ब्राह्मणः यूपी में आख़िरी ब्राह्मण चीफ मिनिस्टर 1989 में हुए,अब वोट बैंक मान रहीं पार्टियां

यूपी में आख़िरी ब्राह्मण चीफ मिनिस्टर 1989 में हुए। नारायण दत्त तिवारी के बाद 32 साल हो गए। कोई ब्राह्मण चीफ मिनिस्टर नहीं बना। बिहार की भी बिल्कुल यही कहानी है। मध्य प्रदेश से लेकर राजस्थान में भी यही चल रहा है।

एक वक्त उत्तर प्रदेश की राजनीति राजपूत बनाम ब्राह्मण की हुआ करते थे अब यादव बनाम राजपूत बनाम दलित की हो रही है। ब्राह्मण सिर्फ एक वोट बैंक बनकर रह चुका है।

सूबे में पिछले 3 दशकों से राजनीतिक पार्टियों के लिए ब्राह्मण समुदाय महज एक वोटबैंक बनकर रह गया है। बसपा ने सतीश चंद्र मिश्रा की अगुवाई में यूपी में ब्राह्मण सम्मेलन का आगाज कर सभी दलों को बेचैन कर दिया है। और अब सपा से लेकर कांग्रेस और बीजेपी तक ब्राह्मण समुदाय को साधने में जुट गई हैं।

नारायण दत्त तिवारी

आजादी के बाद यूपी की सियासत में 1989 तक ब्राह्मण और कांग्रेस का वर्चस्व कायम रहा और 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने। गोविंद वल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी बने। ये सभी कांग्रेस से थे। इनमें नारायण दत्त तिवारी तीन बार यूपी के सीएम रहे। लेकिन, मंडल और कमंडल की राजनीति ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया।

उत्तर प्रदेश में 10 से 12 फीसदी ब्राह्मण होने के बाद 2017 के चुनाव में बीजेपी के कुल 312 विधायकों में 58 ब्राह्मण समुदाय के नेता चुनकर आए थे। इसके बावजूद राज्य सरकार में ब्राह्मणों की हनक पहले की तरह नहीं दिखी। सूबे के 56 मंत्रियों के मंत्रिमंडल में 9 प्रतिनिधि ब्राह्मण समुदाय से हैं।

पिछली बार 2007 में ब्राह्मण वोट बैंक ने यूपी की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू किया था। उस वक्त बसपा के साथ मिलकर ब्राह्मण और दलित गठजोड़ ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी।

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