जाति की राजनीति: जब एक ब्राह्मण नेता ने राजपूत नेता पर जिम्मेदारी सौंपकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी

लोगों का सवाल होगा यहां जाति का जिक्र क्यों किया जा रहा है? सवाल वाजिब भी है। जवाब भी सुन लीजिए। यह भारतीय राजनीति का वह दौर था जब उत्तर प्रदेश और भारत की राजनीति राजपूत बनाम ब्राह्मण की हुआ करती थी।

दोनों नेता एक ही प्रदेश यानी उत्तर प्रदेश से थे। यहां जिन ब्राह्मण नेता का जिक्र हो रहा है वह थे गांधी परिवार के राजीव गांधी और जिन राजपूत का जिक्र हो रहा है वह थे राजपूत के सबसे बड़े चेहरा विश्वनाथप्रताप सिंह।

राजीव गांधी

“अमिताभ” पुस्तक मे सौम्य बंदोपाध्याय लिखते हैं कि विश्वनाथप्रताप सिंह को वित्त मंत्री बनाकर राजीव गांधी ने पहली गलती की थी। उत्तर प्रदेश इस देश को प्रधानमंत्री देता आया था। मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री के बाद वित्तमंत्री का स्थान होता है।

वित्त मंत्रालय को दूसरा शक्ति केंद्र समझा जाता है। अपने राज्य के किसी भी महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति के हाथों किसी भी प्रधानमंत्री ने इसके पहले कभी इतना महत्त्वपूर्ण पद नहीं सौंपा था। नेहरू, शात्री, इंदिराजी, मोरारजी किसी ने भी नहीं। बल्कि यही कोशिश की गई थी कि वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी उसे ही सौंपी जाए जिसके पीछे जनसमर्थन न हो, जो महत्त्वाकांक्षी न हो और जी हुजूरी के अलावा उसमें और कोई योग्यता न हो।

विश्वनाथप्रताप सिंह को वित्तमंत्री बनाकर, उन पर संपूर्ण विश्वास करके सारी जिम्मेदारी सौंपकर राजीव गांधी ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। राजनीतिक दृष्टि से जिस तरह यह प्रकरण राजीव गांधी की दुबर्लता को दर्शाता है, उसी तरह से विश्वनाथप्रताप सिंह की मौकापरस्ती के चरित्र को भी उजागर करता है।

राजनीतिक नैतिकता की दृष्टि से शायद यह ठीक माना जाए, क्योंकि इस देश की वर्तमान राजनीति में नैतिकता को पाँवों की जूती बना दिया गया है। इस राजनीतिक मानदंड से राजीव गांधी को ‘अपरिपक्व’ और विश्वनाथप्रताप सिंह को ‘धुरंधर’ कहा जा सकता है। शायद दोनों ही सटीक विशेषण हैं।

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