जानिए क्या है जलवायु परिवर्तन और इसे समझना क्यों है जरूरी

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मानवीय गतिविधियों और क्रिया-कलापों के कारण दुनिया का तापमान बढ़ रहा है और इससे जलवायु में परिवर्तन होता जा रहा है। अब मानव जीवन के हर पहलू के लिए ख़तरा बन चुका है।

अगर इस पर ग़ौर नहीं किया गया और इसे यूं ही छोड़ दिया गया तो आने वाले समय में तापमान इस क़दर बढ़ जाएगा कि मानव जीवन पर संकट आ सकता है, भयावह सूखा पड़ सकता है, समुद्री जल स्तर बढ़ सकता है और इन सब प्राकृतिक आपदाओं के फ़लस्वरूप कई प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं।

मानव समाज के आगे यह एक बड़ी चुनौती है, लेकिन इस चुनौती से निपटने के लिए कुछ संभावित समाधान भी हैं।

जितनी तेज़ी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसके लिए मानव-क्रियाएं दोषी हैं। घरेलू कामों, कारखानों और परिचालन के लिए मानव तेल, गैस और कोयले का इस्तेमाल करते हैं जिसकी वजह से जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

जब ये जीवाश्म ईंधन जलते हैं तो उनसे ग्रीनहाउस गैस निकलती हैं जिसमें सबसे अधिक मात्रा कार्बन डाइऑक्साइड की होती है। इन गैसों की सघन मौजूदगी के कारण सूर्य का ताप धरती से बाहर नहीं जा पाता है और ऐसे में ये धरती का तापमान बढ़ने का कारण बनती हैं।

19वीं सदी की तुलना में धरती का तापमान लगभग 1.2 सेल्सियस अधिक बढ़ चुका है और वातावरण में CO2 की मात्रा में भी 50% तक वृद्धि हुई है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हम जलवायु परिवर्तन के बुरे परिणामों से बचना चाहते हैं तो हमें अपने क्रिया-कलापों पर ध्यान देते हुए तापमान वृद्धि के कारकों को नियंत्रित करने के बारे में ठोस क़दम उठाने चाहिए. ऐसे उपाय अपनाने चाहिए जिससे ताप वृद्धि धीमी हो वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग को साल 2100 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बनाए रखने की ज़रूरत है।

लेकिन अगर इस संबंध में दुनिया के तमाम देशों ने कोई ठोस क़दम नहीं उठाया तो इस सदी के अंत तक धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ सकता है।

अगर कोई क़दम नहीं उठाया गया तो वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ग्लोबल वार्मिंग 4 डिग्री सेल्सियस से अधिक भी हो सकती है जिसके परिणामस्वरूप दुनिया को भयानक हीट-वेव का सामना करना पड़ सकता है, समुद्र के स्तर में बढ़ोत्तरी होने से लाखों लोग बेघर हो जाएंगे, कई पादप-जंतुओं की प्रजाति विलुप्त तक हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन का क्या प्रभाव है?

प्राकृतिक घटनाओं में जिस तरह से एकाएक बदलाव आए हैं, वह जलवायु परिवर्तन का ही परिणाम है. तूफ़ानों की संख्या बढ़ गई है, भूकंपों की आवृत्ति बढ़ गई है, नदियों में बाढ़ का विकराल स्वरूप आदि घटनाएं पहले से कहीं अधिक बढ़ गई हैं, जिसका सीधा असर जीवन और जीवित रहने के माध्यमों पर पड़ रहा है।

अगर तापमान यूं ही बढ़ता रहा तो कुछ क्षेत्र निर्जन हो सकते हैं और खेत रेगिस्तान में तब्दील हो सकते हैं. तापमान बढ़ने के कारण कुछ इलाक़ों में इसके उलट परिणाम भी हो सकते हैं. भारी बारिश के कारण बाढ़ आ सकती है। हाल ही में चीन, जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड्स में आई बाढ़ इसी का नतीजा है।

तापमान वृद्धि का सबसे बुरा असर ग़रीब देशों पर होगा क्योंकि उनके पास जलवायु परिवर्तन को अनुकूल बनाने के लिए पैसे नहीं।

कई विकासशील देशों में खेती और फसलों को पहले से ही बहुत गर्म जलवायु का सामना करना पड़ रहा है और ठोस क़दम के अभाव में इनकी स्थिति बदतर हो जाएगी।

उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया में ग्रेट बैरियर रीफ़ जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़े समुद्री तापमान की वजह से पहले ही अपने आधे कोरल खो चुकी है।

जंगलों में लगने वाली आग की संख्या भी बीते सालों में बढ़ी है. गर्म और शुष्क मौसम के कारण आग तेज़ी से फैलती है और इनके बार-बार लगने की भी आशंका बढ़ जाती है।

तापमान वृद्धि का एक बुरा असर यह भी होगा कि साइबेरियाई क्षेत्रों में जमी बर्फ़ भी पिघलेगी जिससे सदियों से अवशोषित ग्रीनहाउस गैसें भी मुक्त हो जाएंगी, जिसका बुरा असर होगा।

तापमान बढ़ने के कारण जीवों के लिए भोजन और पानी का संकट बढ़ जाएगा

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उदाहरण के लिए, तापमान बढ़ने से ध्रुवीय भालू मर सकते हैं क्योंकि जो बर्फ़ उनके लिए आवास है और जहां से वे अपने लिए भोजन प्राप्त करते हैं वह तेज़ी से पिघल रही है।

इसके अलावा एक हाथी जिसे प्रतिदिन 150-300 लीटर पानी चाहिए, उसके लिए जीवन का संघर्ष बढ़ जाएगा।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो इस सदी में कम से कम 550 प्रजातियां विलुप्त हो सकती है।

दुनिया के हर क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन का अलग असर होता है. कुछ स्थानों पर तापमान तुलनात्मक रूप से बढ़ जाएगा, कुछ जगहों पर भारी बारिश होगी और बाढ़ आएगी और कुछ इलाक़ों को सूखे की मार झेलनी होगी।

अगर तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर नहीं रखा गया तो क्या होगा

अत्यधिक बारिश के कारण यूरोप और ब्रिटेन में बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं. मध्य पूर्व के देशों में भयानक गर्मी पड़ सकती है और खेत रगिस्तान में बदल सकते हैं, प्रशांत क्षेत्र में स्थित द्वीप डूब सकते हैं, कई अफ्रीक्री देशों में सूखा पड़ सकता है और भुखमरी हो सकती है।

पश्चिमी अमेरिका में सूखा पड़ सकता है बल्कि दूसरे कई इलाक़ों में तूफ़ान की आवृति बढ़ सकती है, ऑस्ट्रेलिया भीषण गर्मी और सूखे की मार झेल सकता है।

धरती के तापमान को नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय यह है कि दुनियाभर के देश इस मुद्दे पर एकसाथ आएं। साल 2015 में हुए पेरिस समझौते के तहत दुनिया के तमाम देशों ने कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने का प्रण लिया था ताकि ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर ना जाने दिया जाए।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर चर्चा और समाधान खोजने के लिए ब्रिटेन नवंबर महीने में विश्व के नेताओं के एक शिखर सम्मेलन का आयोजन करने वाला है जिसे COP26 नाम दिया गया है। जहां दुनिया भर के देश साल 2030 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को सीमित करने के अपनी योजनाओं पर चर्चा करेंगे।

कई देशों ने साल 2050 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने का लक्ष्य रखा है

विशेषज्ञों का मानना है कि इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है लेकिन इसके लिए दुनिया भर की सरकारों, उद्यमों और प्रत्येक शख़्स को अपने स्तर पर बदलाव के लिए प्रयास करने होंगे।

निजी स्तर पर पर्यावरण के लिए दे सकते हैं योगदान

सरकार को अपने स्तर पर बड़े और नीति-परक बदलाव करने की ज़रूरत है लेकिन बतौर जिम्मेदार नागरिक हम अपने स्तर पर भी इस प्रयास का हिस्सा बन सकते हैं।

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