कश्मीर में फिर से निशाने पर पंडित, शुरू हुआ पलायन

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इस देश में जब भी नरसंहार की बात आएगी तो गुजरात नरसंहार के साथ-साथ कश्मीरी पंडितों के दर्द को भी लिखा जाएगा। लिखा जाएगा कि किस तरह इस्लामिक चरमपंथियों ने पंडितों को चुन चुन कर निशाना बनाया।

बीते कुछ दिनों में कश्मीर घाटी में हुई चरमपंथी हिंसा में कई हिंदुओं और कुछ सिखों के मारे जाने के बाद जम्मू और कश्मीर का माहौल एक बार फिर इतिहास की ओर इशारा कर रहा है।

कल रात से कश्मीर घाटी में रहने वाले 1400 हिन्दू सिख परिवार जम्मू पलायन कर गए। दिन तक 250 परिवार और आ रहे हैं। यह आधिकारिक है। पलायन करने वाले अधिकतर परिवार विभिन्न सरकारी दफ्तरों में मुलाज़िम है। दो साल 370 को हटाए हो गए, पांच लाख सुरक्षा बल केवल घाटी में है। इसके बावजूद श्रीनगर में बड़ी संख्या में नागरिकों का मारा जाना चिंता की बात है। सन 1990 की तरह हालात हैं। लोगों की आपसी साझेदारी और भरोसे को तोड़ा जा रहा है। सरकार ने भी गैर हिन्दू सरकारी कर्मचारियों को दस दिन की छुट्टी दे दी है।

कश्मीर में रह रहे रहवासियों के मन में एक ही सवाल आ रहा है कि कि क्या राज्य के हालात फिर से 90 के दशक जैसे हो रहे हैं? क्या घाटी से कश्मीरी पंडितों और राज्य के अल्पसंख्यकों का पलायन एक बार फिर से शुरू हो जाएगा?

घाटी में सिर्फ़ एक हफ़्ते के दौरान सात लोगों की हत्या कर कर दी गई है। वहीं पिछले चंद दिनों में कश्मीरी पंडित और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के लगभग 150 परिवारों ने जम्मू में शरण ली है।

क्यों बढ़ी अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा?

90 के दशक में जब कश्मीरी पंडितों को जबरदस्ती उनके ही घरों से भगा दिया गया था तब स्थानीय लोगों ने क़ब्ज़ा कर लिया या फिर उसे औने-पौने दाम में ख़रीद लिया।

इसके बाद ही साल 1997 में जम्मू राज्य सरकार ने क़ानून बनाकर विपत्ति में अचल संपत्ति बेचने और ख़रीदने के ख़िलाफ़ क़ानून बनाया। हालांकि कानून अपने जगह स्थगित हैं और क़ानून के बावजूद औने-पौने दाम में संपत्ति बिकती रही है।

लेकिन हाल ही में सरकार ने कश्मीरी पंडितों की क़ब्ज़ा की गई अचल संपत्तियों पर उन्हें दोबारा अधिकार देने की कवायद शुरू की थी। और अभी तक ऐसे लगभग 1,000 लोगों को वापस उनकी संपत्ति दे दिया गया। अचानक शुरू हुई हिंसा के पीछे ये भी एक कारण हो सकता है।

वहां रह रहे कुछ लोगों के मुताबिक़ 2008 से ही घाटी में हमलों का सिलसिला जारी है। लेकिन अनुच्छेद 370 हटाने के बाद यहाँ के कट्टरपंथियों में बड़ी बेचैनी रही है। उनके अंदर ग़ुस्सा पनप रहा था, जिसने अचानक से हिंसा की शक्ल ले ली है।

जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट करके इस मसले पर कहा कि , “जो लोग घाटी छोड़कर जा रहे हैं या जाने की सोच रहे हैं, उनसे मैं दिल से अपील करता हूँ कि ऐसा मत कीजिए। हम उन ताक़तों के मंसूबों को कामयाब नहीं होने देंगे, जो आपको भगाना चाहते हैं। ज़्यादा बड़ी आबादी है जो चाहती है कि आप न जाएं।”

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