India exports and tariffs: भारत का व्यापार घाटा घटा, लेकिन निर्यात में गिरावट और टैरिफ वॉर बनी बड़ी चुनौती

India exports and tariffs: भारत का मर्चेंडाइज़ (वस्तु) व्यापार घाटा फरवरी 2025 में घटकर 14.05 अरब डॉलर हो गया है, जो पिछले साढ़े तीन सालों में सबसे कम है। वित्त वर्ष 2025 के पहले 10 महीनों में औसत व्यापार घाटा 23 अरब डॉलर रहा था।
विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में भारत का चालू खाता (Current Account) लगभग 5 अरब डॉलर का अधिशेष (सरप्लस) दिखा सकता है, जो जीडीपी का लगभग 0.5% होगा।
लेकिन निर्यात (Export) में गिरावट और वैश्विक व्यापार में अस्थिरता चिंता का कारण बनी हुई है।
भारत के निर्यात क्यों घट रहे हैं?
फरवरी 2025 में भारत का कुल निर्यात 10.9% घटकर 36.91 अरब डॉलर पर आ गया, जो पिछले 20 महीनों में सबसे बड़ी गिरावट है। सरकार का कहना है कि पिछले साल का उच्च आधार (41.4 अरब डॉलर) इसकी वजह है, लेकिन असली कारण है - अमेरिका की व्यापार नीति और टैरिफ वॉर का असर।
प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति:
इस्पात (Steel) और एल्युमिनियम (Aluminium) निर्यात पर 5 अरब डॉलर का असर पड़ा है।
गैर-पेट्रोलियम, गैर-गहना निर्यात 5% घटकर 28.57 अरब डॉलर पर पहुंचा।
रसायन (Chemicals), पेट्रोलियम और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में भारी गिरावट।
केवल इलेक्ट्रॉनिक्स और चावल के निर्यात में वृद्धि देखी गई।
ट्रंप की टैरिफ वॉर और भारत की स्थिति
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को "टैरिफ किंग" कहा था क्योंकि भारत की औसत आयात शुल्क दर 12% है, जो अमेरिका (2.2%), चीन (3%) और जापान (1.7%) से काफी अधिक है।
इतनी ज्यादा टैरिफ की वजह से:
भारतीय कंपनियों को ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल होता है।
आयातित सामान भारत में महंगे हो जाते हैं।
हालांकि सेवाओं के निर्यात में कुछ वृद्धि हुई है, लेकिन भारत का वैश्विक निर्यात में हिस्सा सिर्फ 1.5% है।
क्या भारत फिर से सुधार की राह पकड़ेगा?
भारत ने 1991 के आर्थिक संकट में उदारीकरण (Liberalisation) अपनाकर इतिहास रचा था। अब फिर, टैरिफ वॉर और वैश्विक दबाव के बीच भारत एक अहम मोड़ पर खड़ा है।
सरकार के हालिया कदम:
अमेरिका के साथ बैठक से पहले व्हिस्की और मोटरसाइकिल जैसे कुछ उत्पादों पर आयात शुल्क कम किया गया।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने निर्यातकों से संरक्षणवादी सोच छोड़ने को कहा है।
भारत, UK, EU और न्यूज़ीलैंड के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर बातचीत कर रहा है।
लेकिन जब तक व्यापक टैरिफ में कटौती और संरचनात्मक सुधार नहीं होंगे, भारत ग्लोबल सप्लाई चेन के लाभ से वंचित रह सकता है।
विशेषज्ञों की राय: आयात शुल्क कम करना ज़रूरी
अर्थशास्त्री विरल आचार्य और राजेश्वरी सेनगुप्ता का मानना है कि भारत की उच्च टैरिफ नीति ने प्रतिस्पर्धा को कमजोर किया है।
चीन ने कैसे सफलता पाई:
कम लागत वाली मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देकर रोजगार और निर्यात दोनों बढ़ाए।
भारत के कपड़ा और परिधान उद्योग अब भी संरक्षणवाद की वजह से पीछे हैं।
भारत को चाहिए:
आयात शुल्क घटाए
पोर्ट, सड़क, लॉजिस्टिक्स में सुधार करे
SMEs को ट्रेनिंग और फंडिंग दे
UK, EU और ASEAN देशों से व्यापार को और मजबूत करे
यह भारत का 1991 जैसा पल हो सकता है
इकोनॉमिक सर्वे 2024 में चेतावनी दी गई है कि बढ़ती वैश्विक संरक्षणवादी नीतियां भारत के लिए चुनौती हैं। सर्वे ने एक स्पष्ट व्यापार नीति रोडमैप की सिफारिश की है ताकि भारत ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धी बन सके।
आज की स्थिति में:
ग्लोबल कंपनियां सप्लाई चेन बदल रही हैं
भारत के पास निवेश खींचने का मौका है
लेकिन नीतिगत साहस की ज़रूरत है
निष्कर्ष: क्या भारत बढ़ेगा आगे या करेगा पीछे कदम?
भारत इस समय व्यापारिक मोर्चे पर दो राहों पर खड़ा है।
टैरिफ घटाकर, मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाकर और ग्लोबल ट्रेड से जुड़कर वो बड़ी ताकत बन सकता है।
या फिर पुराने रास्ते पर चलकर अवसरों से चूक सकता है।
निर्णय भारत को लेना है।
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