India skill development 2025: छठी कक्षा से शुरू होगी व्यावसायिक शिक्षा

India skill development 2025: केंद्र सरकार ने समग्र शिक्षा अभियान के तहत छठी कक्षा से ही व्यावसायिक शिक्षा शुरू करने की योजना बनाई है। इस पहल का उद्देश्य छात्रों को प्रारंभिक स्तर पर ही प्रायोगिक और नौकरी से जुड़ी कौशल शिक्षा देना है, जिससे उन्हें भविष्य में बेहतर रोजगार के अवसर मिल सकें।
यह नीति दिखने में तो प्रशंसनीय है, लेकिन इसके सफल कार्यान्वयन में कई चुनौतियां भी हैं – जैसे स्कूलों की तैयारी, आधारभूत संरचना की कमी और उद्योग जगत से तालमेल की कमी। अगर इन चुनौतियों को दूर नहीं किया गया तो यह योजना भी बाकी कागज़ी योजनाओं की तरह रह सकती है।
भारत क्यों है पीछे, और अन्य देश कैसे कर रहे हैं सफलतापूर्वक लागू?
जर्मनी का डुअल एजुकेशन सिस्टम और चीन की 11,300 व्यावसायिक स्कूलों की व्यवस्था इस क्षेत्र में आदर्श मानी जाती है। चीन हर साल लगभग 1 करोड़ कुशल छात्र तैयार करता है, जो देश की मज़बूत श्रमशक्ति में योगदान देते हैं।
इसके मुकाबले भारत में मात्र 4.1% लोग (15–59 आयु वर्ग) को ही औपचारिक व्यावसायिक शिक्षा मिली है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत को अपने स्किल डेवलपमेंट सिस्टम में आमूलचूल बदलाव करने की ज़रूरत है।
पश्चिम बंगाल की पहल: उत्कर्ष बांग्ला योजना से छह लाख युवाओं को प्रशिक्षण
कुछ राज्य व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय दिखे हैं। पश्चिम बंगाल ने 'उत्कर्ष बांग्ला योजना' के तहत 2,000 से अधिक स्कूलों में इलेक्ट्रॉनिक्स, हॉस्पिटैलिटी, हेल्थकेयर जैसे कोर्स शुरू किए हैं। इस योजना से हर साल लगभग 6 लाख युवाओं को स्किल ट्रेनिंग दी जा रही है।
लेकिन अभी भी इस राज्य को उद्योग जगत से ठोस साझेदारी की आवश्यकता है, जो तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अच्छी तरह से स्थापित है।
बुनियादी ढांचे की कमी: व्यावसायिक शिक्षा की राह में बड़ी रुकावट
राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण (NSS) 2018–19 के अनुसार, भारत के 40% सरकारी स्कूलों में प्रयोगशालाएं ही नहीं हैं। शहरी क्षेत्रों में कुछ सुधार हुआ है लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी स्कूल अब भी संसाधनों और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं।
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) की असफलता इसका उदाहरण है – बिना तैयारी के योजना शुरू की गई और लाखों छात्रों को प्रशिक्षित तो किया गया, लेकिन रोजगार नहीं मिला। इसीलिए अब ज़रूरत है कि योजना को फेज़-वाईज़ लागू किया जाए, पहले शहरी क्षेत्रों में फिर धीरे-धीरे ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तार किया जाए।
उद्योग की भागीदारी: आज की सबसे ज़रूरी कड़ी
FICCI-EY 2023 रिपोर्ट के मुताबिक, 70% कंपनियों को कुशल कर्मचारियों की कमी महसूस होती है, फिर भी बहुत कम कंपनियां प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़ती हैं।
गुजरात ने निजी उद्योगों को आईटीआई (ITI) कॉलेजों के संचालन में शामिल कर इस कमी को दूर किया है। वहीं कर्नाटक में इन्फोसिस और विप्रो जैसी कंपनियां छात्रों को प्रशिक्षण देती हैं।
पश्चिम बंगाल को भी चाहिए कि वह इन मॉडलों से सीखकर उद्योग और शिक्षा के बीच मजबूत पुल बनाए।
गुणवत्ता भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी पहुंच
साउथ कोरिया में 96% व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त लोग रोज़गार में हैं, क्योंकि वहां का प्रमाणन (certification) और प्रशिक्षण सिस्टम काफी मजबूत है।
भारत का स्किल इंडिया मिशन अभी तक केवल 50% रोजगार दर तक ही पहुंच पाया है। सिंगापुर का WSQ मॉडल, जहां नियोक्ताओं की फीडबैक से कोर्स लगातार अपडेट होते हैं, भारत के लिए एक प्रेरणास्त्रोत हो सकता है।
भविष्य की नौकरियों के लिए तैयार करना ज़रूरी
India Skills Report 2024 के अनुसार, भारत के केवल 47% युवा ही व्यावसायिक प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार योग्य माने जाते हैं। इसकी बड़ी वजह है कि सीखाई गई स्किल और उद्योग की ज़रूरतों में मेल नहीं है।
जबकि आंध्र प्रदेश जैसे राज्य रिन्यूएबल एनर्जी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में ट्रेनिंग दे रहे हैं, वहीं पश्चिम बंगाल अभी भी पारंपरिक कोर्सों (जैसे बढ़ईगिरी, प्लंबिंग) पर केंद्रित है। आने वाले समय में रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में 17 लाख कुशल कर्मचारियों की जरूरत होगी।
निष्कर्ष: नीति अच्छी है, ज़रूरत है ठोस अमल की
सरकार की योजना सही दिशा में एक कदम है, लेकिन अगर बुनियादी ढांचा, उद्योग से जुड़ाव, प्रशिक्षकों की गुणवत्ता, और कोर्स की प्रासंगिकता सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह योजना भी केवल एक घोषणा बनकर रह जाएगी।
अगर इन मुद्दों पर रणनीतिक रूप से काम किया जाए, तो भारत की युवा आबादी को कुशल बनाकर न केवल उन्हें रोज़गार मिल सकता है, बल्कि देश की आर्थिक वृद्धि में भी तेज़ी आ सकती है।